इन बेज़ुबां ख़्वाबों का क्या करूं
चाहा है इन ख़्वाबों से कुछ बातें करूँ गर्म कॉफ़ी के उठते धुंए से कोई नाता जोडूँ जाने क्यूँ ये ख्वाब कुछ कहने से कतराते हैं पर हर सुबह मेरे तक...
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इन बेज़ुबां ख़्वाबों का क्या करूं
चाहा है इन ख़्वाबों से कुछ बातें करूँ गर्म कॉफ़ी के उठते धुंए से कोई नाता जोडूँ जाने क्यूँ ये ख्वाब कुछ कहने से कतराते हैं पर हर सुबह मेरे तक...