तुम..... खोल दिए हैं मैंने सब दरवाज़े जाना चाहते हो तो जाओ सांकल चढ़ा तुम्हें रोकूँ और ...... जाना चाहते हो न जाओ .... रश्मि प्रभा ==================================================== तुम..... जैसे कुछ पन्ने उड़ करकभी वापस आते नहीं,तुम भी किस्तों मेंउड़ जाते तो अच्छा रहता. तुम इतने गहरे व तीखेहो चले हो किमन की गिरहें भी काट लूँ, तो भीतुम्हारा जाना अब संभव नहीं लगता. गीली मिटटी –सा मेरा मनढले भी तो सिर्फ तेरे सांचे में;मैं सूख कर भी ढूँढूं तुम्हें,बनते दरारों के रेखाजाल में. कोई पीपल - सा बीजमन में बो गए हो तुम;यादें आकर सींचती रही,धीरे-धीरे तुम बढ़ने लगे हो मुझमें. मैं तंग आ गई हूँ अब तुमसेतुम चले जाओ दूर मुझसे;इक घुटन – सी निकलती आहकि क्यूँ तुम आए मेरे पास? मत आओ मुझे बहलाने,जब होऊं तुम्हें लेकर मैं उदास;तुम पलट के फिर मुस्काते हो मानो मेरे हर सवालों का तुम जवाब हो ... वन्दना महतो http://vandanamahto.blogspot.com/ मेरा परिचय : मेरा नाम बन्दना महतो है. मैं मूलत:झारखण्ड की रहनेवाली हूँ. अब तक मैंने सिविल इंजीनियरिंग में बैचेलर व मास्टर की डिग्री पूरी की है और अभी आई.आई.टी. खडगपुर से पी.एच.डी. कर रही हूँ. लेखन की ओर रुझान बचपन से ही था, शायद सातवीं कक्षा से लिखना शुरू किया था. हिंदी ब्लॉग जगत से परिचय २००७ में ही हुआ. जीवन के अहसासों को शब्दों में बंद कर हमेशा के लिए संजो लेने की कोशिश ही है शायद, जिससे मुझे लिखते रहने की प्रेरणा मिलती है.....! तुम..... खोल दिए हैं मैंने सब दरवाज़े जाना चाहते हो तो जाओ सांकल चढ़ा तुम्हें रोकूँ और ...... जाना चाहते हो न जाओ .... रश्मि प्रभा ========... Read more » 11:00 AM