तवायफ़ की इक रात ....
कितनी तिरस्कृत हूँ मैं और ग्रन्थ को परे रख तुम कितने सात्विक !.... फर्क इतना रहा तुम मुझे अलग करते गए और खुद को जोड़ते गए ! रश्मि प्रभा ...
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तवायफ़ की इक रात ....
कितनी तिरस्कृत हूँ मैं और ग्रन्थ को परे रख तुम कितने सात्विक !.... फर्क इतना रहा तुम मुझे अलग करते गए और खुद को जोड़ते गए ! रश्मि प्रभा ...