फूल तेतरी ने फूल गढ़ा है अपने घर के बाहर अपनी मिट्टी की दीवार पर फूल बहुत सुंदर है बहुत सच्चा लगता है गली से आते-जाते लोगों को वह बहुत अच्छा लगता है पर कैसी भी हवा चले तेतरी के बिन दरवाजे घर में फूल की सुगन्ध कोई, कभी नहीं आती घर के भीतर तो कालिख भरा धुआँ फैला रहता है जो तेतरी की आँखों में पानी भरता रहता है यह कैसा मज़ाक़ है कि तेतरी के हाथ से बने फूल हँसते हैं और तेतरी के हाथ हँसी को तरसते हैं ! हरे प्रकाश उपाध्याय हरे प्रकाश उपाध्याय हिन्दी की नयी पीढ़ी के संवेदनशील एवं सजग कवि हैं। ५ जनवरी १९८१ को भोजपुर बिहार के गाँव 'बैसाडीह' में जन्मे हरे प्रकाश ने जैसे-तैसे बी॰ए॰ की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में फीचर संपादक के पद पर कार्यरत हैं। 'अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार' से सम्मानित हैं। फूल तेतरी ने फूल गढ़ा है अपने घर के बाहर अपनी मिट्टी की दीवार पर फूल बहुत सुंदर है बहुत सच्चा लगता है गली से आते-जाते लोगों को ... Read more » 12:19 PM