आत्मदाह भूमिका तो वे बनाते हैं जिन्हें ज़मीन खींचनी होती है जिनकी ज़मीन हैउनके लिए भूमिका कैसी !मुझे जीना है ... मरने से पहले, बस कुछ अपने लिए रश्मि प्रभा ======================================================================== आत्मदाह कोशिशें, किसी उपग्रह से असफलता का चक्कर लगाती हुईं मेरे ज़ख्मों की डायरी को दीमक बनकर चाट गयीं ! भावनाएं, अनियंत्रित चुम्बकीय मान्यताओं से चिपक कर ठूँठ हो गयीं और सपने , आँखों की गहराई नापते-नापते सागर की सच्चाई हो गए ! फिर भी मेरा विश्वास हाथों में बहारों का राजाज्ञा -पत्र लिए यूँ ही राजमहल की सड़कों पर पसरे-पसरे उस सोने की मेहराब को देखता रहा , जिसका कम से कम एक अणु मेरे संकल्प का पुनर्जनम है , मेरे ख़ून की शहादत है ! मगर आज मैं तुम्हारा राजाज्ञा-पत्र तुम्हें वापस करता हूँ, तुम मेरी क्रांति को मुक्त कर दो! मुझे मेरा वह अणु लौटा दो, जिसकी आँच में अपने लहू को खौलाकर फिर से पी सकूँ , और आत्मदाह की पीड़ा से मुक्त होकर कम से कम क्षण भर और जी सकूँ ! -ज्ञानचंद मर्मज्ञ http://www.marmagya.blogspot.com/मैंने अपने को हमेशा देश और समाज के दर्द से जुड़ा पाया. व्यवस्था के इस बाज़ार में मजबूरियों का मोल-भाव करते कई बार उन चेहरों को देखा, जिन्हें पहचान कर मेरा विश्वास तिल-तिल कर मरता रहा. जो मैं ने अपने आसपास देखा वही दूर तक फैला दिखा. शोषण, अत्याचार, अव्यवस्था, सामजिक व नैतिक मूल्यों का पतन, धोखा और हवस.... इन्हीं संवेदनाओं ने मेरे 'कवि' को जन्म दिया और फिर प्रस्फुटित हुईं वो कवितायें,जिन्हें मैं मुक्त कंठ से जी भर गा सकता था....... ! आत्मदाह भूमिका तो वे बनाते हैं जिन्हें ज़मीन खींचनी होती है जिनकी ज़मीन है उनके लिए भूमिका कैसी ! मुझे जीना है ... मरने से पहले, बस कुछ अपन... Read more » 11:00 AM