गज़ल उदासी कैसी ? ख्यालों की किरचें जीने का सबब बनती हैं जितना गहरा घाव होता है उतनी ही शिद्दत से सुबह होती है .... रश्मि प्रभा ===============================================================गज़ल हर लम्हा टूटती हुई मुफलिस की आस हो. क्या सानेहा हुआ है कि इतने उदास हो. सच-सच कहो कि ख्वाब में डर तो नहीं गए आंखें बुझी-बुझी सी हैं कुछ बदहवास हो. सीने में ख्वाहिशों का समंदर है मौजज़न तुम फिर भी रेगजारे-तमन्ना की प्यास हो. बाहर चलो के लज्ज़तें बिखरी हैं चार-सू मौसम तो खुशगवार है तुम क्यों उदास हो. वो दिन गए कि तुमसे मुनव्वर थे मैक़दे अब तुम सियाह वक़्त का खाली गिलास हो. जिस पैरहन में आबरू रक्खी थी चाक है यानी हिसारे-वक़्त में तुम बेलिबास हो. गौतम ग़मों की धूप से कोई गिला न कर शायद ख़ुशी के बाब का ये इक्तेबास हो. ----देवेंद्र गौतम गज़लगंगा (gazalganga.blogspot.com) सुनो भाई साधो (ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com) खबरगंगा (khabarganga.blogspot.com) चौथा खम्भा (chauthakhambha-gazalganga.blogspot.com) अंतर्जाल में बेताल(devendragautamindia.blogspot.com) सम्प्रति-सम्पादकीय प्रभारी,7 डेज वीकली, रांची 1977-78 के दौरान ग़ज़लें कहनी शुरू की. हिंदी-उर्दू की पत्र-पत्रिकाओं में कई ग़ज़लें छपीं.1984 -85 के दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरा. कई दैनिक, साप्ताहिक और पाक्षिक पत्रों के सम्पादकीय विभाग में रहा. इस चक्कर में शेरो-शायरी की दुनिया से कुछ कट सा गया. ग़ज़लें होती थीं तो डायरी में पड़ी रहती थीं.1910 में ब्लॉग और फेसबुक डायरी से ग़ज़लें बाहर निकलने लगीं. अब तक 150 से ज्यादा ग़ज़लें हो चुकीं है. लेकिन कोई संकलन प्रकाशित नहीं. गज़ल उदासी कैसी ? ख्यालों की किरचें जीने का सबब बनती हैं जितना गहरा घाव होता है उतनी ही शिद्दत से सुबह होती है .... रश्मि प्रभा ========... Read more » 11:00 AM