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कविता की कविता : बिन डोर के.... कविता की कविता : बिन डोर के....

कुछ लोग उतर जाते हैं दिल में बिन आहट ,बिन दस्तक के जैसे हो प्रारब्ध का कोई रिश्ता खींचे चले आते हैं बिन डोर के । सुषुप्त थीं अहसासों ...

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12:59 PM

ठुकरा दिया मैंने खुदा ठुकरा दिया मैंने खुदा

बंद आँखों पे समझना न नींद का कहर धुंधला न जाएँ सपने सो पलकें गए हैं ठहर । खो गए हो दुनिया की भीड़ में छोड़ मेरा दामन वक़्त थम गया ,...

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11:33 AM

आ गयी बदरिया आ गयी बदरिया

  किरणों ने अवशोषण कर नीर समुद्र का सजाया है श्वेत - श्याम श्रृंगार नभ का विरह अगन धधकाने आ गयी बदरिया दूत बन जाओ मेघ बड़ी लम्बी है डगरिया ...

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10:17 AM

तुम नज़्म मेरी तुम नज़्म मेरी

लताओं सी नाज़ुक यादें जब गहराने लगती हैं फि़ज़ां की खुशबू कुछ जानी पहचानी सी लगती है । ज़माने की हमदर्दी जब शूल बन जाती है वेदना ,शब्द...

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10:42 AM

" बरगद –आत्मकथ्य" " बरगद –आत्मकथ्य"

अपनी विशालता को पहचानो कितने पौधे तुमसे ऊष्मा पाते हैं कितने राहगीर आराम ... लाभ हानि तो हर रिश्तों में है तो क्या अपने वजूद से रूठ जाएँ !...

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9:36 AM
 
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