खोटे सिक्के रोबोट बनाते हैं
अब इन्सान की तलाश किसी को नहीं
रोबोट ही असली पहचान देते हैं
... आलोचना करो
या हंसो
खोटे का बोलबाला है ....


रश्मि प्रभा


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ये खोटे सिक्के


आदमी सिक्के को
सिक्के आदमी को
खोटा बनाते हैं।
वो एक दूसरे को
छोटा बनाते हैं।
और आजकल सिक्के
टकसाल में नहीं
आदमी की हथेली
पर ढल रहे हैं।
और बच्चे
मां की गोद में नहीं
सिक्के की परिधि में
पल रहे हैं।
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महेन्द्र श्रीवास्तव

17 comments:

  1. ओह कितना कड़बी सच्चाई को शब्दों की मोती पिरो कर कविता की शक्ल दे दी है, आभार।
    अच्छी कविताआंे से रूबरू कराने के लिए आपका आभार।

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  2. खूबसूरत कथन .अच्छी कविता

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  3. आज कल पैसा ही सब कुछ है .. सुन्दर रचना

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  4. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति, आभार.

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  5. वाह ..बहुत बढि़या।

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  6. बहुत ही गहन...

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  7. वाह!!!
    बेहतरीन रचना महेंद्र जी...और सटीक भूमिका रश्मि दी..
    सादर.

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  8. बहुत अच्छी बात काही है आपने
    "वो एक दूसरे को
    छोटा बनाते हैं।"
    पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ...ध्न्यवाद |

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  9. गागर मे सागर भर दिया महेन्द्र जी ने………सटीक ।

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  10. कल 20/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  11. महेन्द्र श्रीवास्तव जी की रचना बहुत सुन्दर है!
    --
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहाँ, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (Friday) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  12. कथ्य सुन्दर संप्रेषित है, धन्यवाद ।

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  13. छोटी लेकिन धारदार कविता। भौतिकवाद पर करारा प्रहार।

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  14. आप सभी का बहुत बहुत आभार

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