ज़िन्दगी के कैनवस पर
विविध एहसास टंगे होते हैं
कभी तेरे कभी मेरे ....



रश्मि प्रभा




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एक समय था जब जीवन में बहुत संघर्ष चल रहा था, उस समय की कुछ अजीब सी रचनाएँ..........

(1) मेरा जूता

मेरे पैर का अंगूठा
अक्सर मेरे
फटे हुए जूते में से
मुह निकाल कर झांकता है
और कहता है...
कम से कम अब तो
रहम करो
इस जूते पर और मुझ पर
जब भी कोई पत्थर देखता हूँ
तो सहम उठता हूँ ,
इतने भी बेरहम मत बनो
किसी से कर्ज ले कर ही
नया जूता तो खरीद लो !

(२) मेरी कमीज

मेरी कमीज
जिसकी जेब
अक्सर खाली रहती है
और मेरी कंगाली पर
हंसती है,
मैं रोज सुबह
उसे पहनता हूँ
रात को पीट पीट कर
धोता हूँ
और निचोड़कर सुखा देता हूँ
शायद उसे
हंसने की सजा देता हूँ !

(3)मेरी पतलून

मेरी पतलून
जो कई जगह से फट चुकी है
उसकी उम्र भी
कब की खत्म हो चुकी है,
फिर भी वो बेचारी
दम तोड़ते हुए भी
मेरी नग्नता को
यथासंभव ढक लेती है,
परन्तु फिर भी
मैं
नयी पतलून खरीदने को आतुर हूँ !

(4) मेरा ट्रांजिस्टर

आज फिर से
मेरा ट्रांजिस्टर
याचना सी कर रहा है मुझसे
अपनी मरम्मत के लिए,
एक समय था
जब बहुत ही सुरीली तान में
वो बजता था
और मैं भी
उसके साथ गुनगुनाता था,
पर आज
मरघट सा सन्नाटा है
मेरे घर में
बिना ट्रांजिस्टर के !
(5) मेरा फूलदान
मेरे घर का फूलदान
जिसे मैंने
नकली फूलों से सजाया है,
अक्सर मुझे
तिरछी नज़रों से देखता है,
मानो कह रहा हो....
कि तुम भी
इन्ही फूलों जैसे हो
जो ना तो खुश्बू देते है
और ना ही
जिनकी जड़ें होती है !


नीलेश माथुर,
देवमती भवन, रीहाबारी, गुवाहाटी-७८१००८
फोन न. 9957565244

12 comments:

  1. बहुत सुंदर ..

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  2. ज़िन्दगी और उसकी धरोहरों के सुन्दर और भावुक बिम्बों से सराबोर रचनाओं के लिये नीलेश जी को बधाई!

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  3. कैनवास पर बड़ी ही सुन्दरता से ज़िन्दगी के रंगों से चित्र उकेर दिया...
    सत्य अहसास...

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  4. man ko bojhil karti hui khoobsurat si kavita.

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  5. मानो कह रहा हो....
    कि तुम भी
    इन्ही फूलों जैसे हो
    जो ना तो खुश्बू देते है
    और ना ही
    जिनकी जड़ें होती है !

    बहुत ही खूब कहा है आपने ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  6. नीलेशजी की पांचो कवितायें अदभुद हैं.. अंतिम कविता 'फूलदान ' ने तो हमारी जड़ें हिला दी...

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  7. kenvas par sajaya gaya chitr, aapki chutikaon ke anuroop dikha,

    ek ek chutika ne puri tanmayta se prahaar kiya,

    bahut maja aaya, padhne me,

    sadhubaad

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  8. वह वह ज़िन्दगी के कैनवस पर चित्रित बेहतरीन चित्र.. बढ़िया लगा..

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  9. नीलेश जी की पांचो कवितायें ह्रदयस्पर्शी हैं .. वास्तविक धरातल पर लिखी ये रचनाएँ मन को गहरे छूती हैं ...आभार ... सार्थक सुन्दर प्रस्तुति के लिए दीदी जी आपका आभार

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  10. संघर्ष से उत्पन्न भावों का कोई सानी नहीं ... बेहतरीन क्षणिकाएं ... बहुत दिन बाद इतनी सुन्दर रचना पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ ... निलेश जी को बधाई !

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  11. रश्मि जी और आप सभी को धन्यवाद!

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  12. बहुत ही खूब कहा है आपने ...बेहतरीन प्रस्‍तुति

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