चोट लगी तो जाना
खुदा पत्थर क्यूँ हुआ ...
ताउम्र वो पत्थरों को इन्सान बनाने में लगा रहा ...




रश्मि प्रभा


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"पत्थर"

ता-उम्र पत्थरों को पूजा
पत्थरों को चाहा
ये जानते हुए भी
पत्थरों में दिल नहीं होता
पत्थरों के ख्वाब नहीं होते
पत्थरों में प्यार नहीं होता
कोई अहसास नहीं होता
पत्थरों को दर्द नहीं होता
कोई जज़्बात नहीं होते
फिर भी पत्थरों को ही
अपना खुदा बनाया
पत्थरों की चोट खा-खाकर
पत्थरों ने ही
हमको भी पत्थर बनाया
हर अहसास से परे
पत्थर सिर्फ़ पत्थर होते हैं
जो चोट के सिवा
कुछ नहीं देते
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वंदना

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना वंदना जी की...और रश्मि जी का तुड़का भी कुछ कम नहीं.. आभार इन बेहतरीन कृतियों के लिए..

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  2. मेरी रचना को यहाँ स्थान देने के लिये रश्मि जी आपकी आभारी हूं।

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  3. चोट लगी तो जाना
    खुदा पत्थर क्यूँ हुआ ...
    ताउम्र वो पत्थरों को इन्सान बनाने में लगा रहा ...
    वाह ...बहुत ही बढि़या ... बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिए आभार ।

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  4. वंदना जी की बहुत सुन्दर रचना...बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिए आभार ।

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  5. ता-उम्र पत्थरों को पूजा

    आर्य बनते तो पत्थर न पूजते और न ही चोट खाते।

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  6. वंदना जी यह अनोखा पत्‍थ्‍ार कहां मिला आपको। सुंदर कविता।

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  7. पत्थर तो पत्थर ही होते हैं

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  8. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-715:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  9. अच्छी रचना...
    सादर बधाई...

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